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08/05/2024 Kajal sah Awareness Views 309 Comments 0 Analytics Video Hindi DMCA Add Favorite Copy Link
कविता : जागरण गीत

कविता : जागरण गीत अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ। कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम साधना से सिहकर मुड़ते रहे तुम अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूंगा आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ, सुख नहीं यह, नींद में सपने सँजाना, दुख नहीं यह, शीश पर गुरु भार ढोना। शूल तुम जिसको समझते थे अभी तक फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ। देखकर मँझधार को घबरा न जाना हाथ ले पतवार को घबरा न जाना। मैं किनारे पर तुम्हें थकने न दूंगा पार मैं तुमको लगाने आ रहा हूँ। तोड़ दो मन में कसी सब श्रृंखलाएँ, तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ। बिंदु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ। तुम उठो, धरती उठे, नभ शिर उठाए तुम चलो गति में नई गति झनझनाए विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ। धन्यवाद कवि - सोहनलाल द्विवेदी।

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